अन्तर्मन
से जन्मीं हर एक, कविता मेरी अधूरी है
शब्द
तुम्हीं कुछ बतलाओ कि क्या ऐसी मजबूरी है
नफ़रत
लोगों के सीनें में, तब से अब तक पसरी है
मंदिर-मस्ज़िद
की ज़द वाली दुनिया कितनी बहरी है
क्यूँ
इतने निष्प्राण रहे सब, क्यूँ इतने अनजान रहे
जब
कि सबके आस-पास में, राम, कहीं रहमान रहे
जाति-धरम-मज़हब
की जब तक मानवता से दूरी है
अन्तर्मन
से जन्मीं हर एक, कविता मेरी
अधूरी
है
बादल-दरिया
ने कब पूँछा, पानी देकर जाति तेरी
कब
तरुवर ने पूँछा आख़िर, फल के बदले जाति तेरी
फिर
क्यूँ कसदन मानव तू ही, जाति-धर्म का दास बना
क्या
बदला दुनिया में आख़िर बस खूनी इतिहास बना
जब
तक सूरज चाँद को लेना अनुमति तेरी ज़रूरी है
अन्तर्मन
से जन्मीं हर एक, कविता मेरी अधूरी है
बेईमानों
की पहल हर जगह, अब तक रही पहेली है
दर
से लेकर दफ्तर तक जब, रिश्वत रही सहेली
है
ख़ुदगर्जों
को फुरसत कब है, अपने हित के धंधों से
भ्रष्ट
तन्त्र की शाखायें कब ?, जुड़ीं ज़रुरतमंदों से
राजनीति
और प्रशासन में जब तक हाँ - हुजूरी है
अन्तर्मन
से जन्मीं हर एक, कविता मेरी अधूरी है
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