Sunday, 14 February 2016


दर्द जब हद से गुजर जाता है तो रोने लगता हूँ
मानों कि  ख़ुद  से  ही, फिर  दूर होने लगता हूँ
लोग हँसते हैं, मेरी आँखों में अश्कों को देखकर
नक़ली ही सही, फिर एक मुस्कान ढोने लगता हूँ

बड़ी बेवाकी से लोग कहते हैं कि बड़ा ज़ज्बाती हूँ
कोई कहता कि मैं पुराना खयाली और देहाती हूँ    
यूँ “रात गयी बात गयी” का मिसरा याद करके
फिर एक अनजाने से ख़्वाब में खोने लगता हूँ 

लोग कहते कि जीने के लिए चालाकी भी ज़रूरी है
मुझे तो पता भी नहीं कि ये किस खेत की मूली है
कई बार खाया हूँ धोखा, यूँ सरे आम लुट कर जब 
तो कभी दुनिया पे, कभी खुद पे हैरान होने लगता हूँ 

जब कोई अपना कहता है, कि तुम मेरे लायक नहीं
कभी कभी सोचता हूँ कि इतना भी नालायक नहीं
समंदर में एक कश्ती सा, सफ़र को निकला हूँ, मैं 
जूझता हूँ सिरफ़िरी लहरों से, कभी डूबने लगता हूँ 

कभी कुछ खोने का गम, कभी कुछ पाने की ललक
कभी खुद से ज़िद, तो  कभी जीने  की  ज़द्दोज़हद
अपने दिल से साँसों की सिफ़ारिश  करते करते
इस तरह से ख़ुद के कुछ अहसान ढोने लगता हूँ

अरसा  गुज़र गया, कभी पास, कभी दूर रहकर
 थक हार सा गया अब, मोहब्बत के सुबूत देकर
अब भी  वो  कहता है  कि, मैं  कैसे  यकीं  करूँ    
कभी कभी सुनकर ये, परेशान होने लगता हूँ

कभी हल्की फुल्की शरारतों से, मुझे वो हँसाता है
कभी बहकी बहकी बातों से, मुझे वो सताता है
बेहद पसंद है मुझे वो, जैसा भी है, उसके बग़ैर
भरी महफ़िल में आज भी, अकेला होने लगता हूँ 

यूँ मोहब्बत को मुक़म्मल, बनाने की ख्वाईसों में
 ज़माने की तरह तरह की, तमाम आज़माइशों में 
बिखर कर संभलने की, कोशिशों में बीते पल 
याद करता हूँ तो, ख़ुद का मेहमान होने लगता हूँ

कभी एक बेज़ुबान की तरह, यूँ खामोश रहता हूँ 
कभी कभी बीती बातों के, आगोस में रहता हूँ
यूँ तो बुनियादी ख़ामियाँ हैं सभी में, ये सोचते हुए
नींद में जगता हूँ तो कभी जागते हुए सोने लगता हूँ

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