मैं
बुरा आदमी हूँ, पीठ पीछे अक्सर लोग कहते हैं
क्योंकि
मैं सदियों से चली आ रही, उन परम्पराओं,
जो आज
के समाज को गलत दिशा में ले जा रही हैं,
का
पुर-विरोध करता हूँ
मैं
दहेज़ लेने और देने को एक बुराई कहता हूँ
मैं
अक्सर हृदय में उठती पीड़ा को,
संगठित
शब्दों में पिरोने की कोशिश करता हूँ
मैं
अकेला कुछ नहीं कर सकता, मेरे तमाम मित्र
कहते
हैं
मैं
बुरा आदमी हूँ, पीठ पीछे अक्सर लोग कहते हैं
मुझे
भेद करना नहीं आता, तमाम जातियों और धर्मों में
मैंने
आजतक जाति और धर्म के नाम, लड़ाईयाँ और कत्ले-आम देखें हैं
मैं
अक्सर कहता हूँ धर्म समाज के लिए है
समाज
धर्म के लिए नहीं
कुछ
बातें हर धर्म में गलत सिद्ध होती हैं इस दौर के लिहाज़ से
और
बहुत कुछ सही होता है हर धर्म में, सबके लिए
मुझे
किसी धर्म को नहीं, बल्कि हर धर्म की, वो हर चीज़
जो इस
धरती पर एक बेहतर समाज बनाती हो,
आगे
लेकर चलना चाहिए, क्योंकि ईश्वर भी एक है
इतिहास
सबूत है कि जातियाँ कर्म के आधार पर बनाई गईं थी
मेरी
पहचान मेरे कर्म से हो, मेरी जाति से नहीं
क्योंकि
इस दौर में लोग जातीय कर्मों से ऊपर आ रहे हैं
तो
फिर क्या मायने हैं ? चली आ रही जातियों के
लोग
खुद बदलना नहीं चाहते, समाज बदलने की बात करते हैं
मैं
बुरा आदमी हूँ पीठ पीछे अक्सर लोग कहते हैं
No comments:
Post a Comment