वो
मोहब्बत न सही,
नफ़रत ही करता, मगर दिल से
मेरी दीवानगी शायद
कभी बदनाम ना होती
मोहब्बत के उसूलों से
हुआ ना रु-ब
-रु होता
तो शायद
ये कहानी आज अहले आम ना होती
नहीं
वाज़िब कभी
समझा, किसी के दिल से मैं खेलूँ
नहीं तो
जिंदगी मेरी, कभी
नीलाम ना होती
न करता
गर उसूलों की, परस्ती आज तक इतनी
तो शायद अबतलक,
इस जिंदगी में शाम ना होती
बहुत आसान होता
है, हज़ारों वायदे
करना
निभाता
वो, तो मोहब्बत ये, कभी
इल्ज़ाम ना ढोती
ज़माना लाख
बदला पर, कभी बदले ना
होते तुम
इबादत सी
मोहब्बत ये, कभी
इल्ज़ाम ना ढोती
अगर करते
कभी तुम कोशिशें, वादा
निभाने की
मेरी हस्ती
भी शायद ये,
कभी बेजान ना
होती
लगा
सदमा है
सादिल को, तेरी वादा-खिलाफ़ी का
नहीं तो
ज़िंदगी शायद, ज़हर का जाम ना होती
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