Sunday, 14 February 2016


मैं  सूफ़ी   साधू
कुछ भी ना माँगू
सब कुछ तो लुटाकर
घर- वार  भी  त्यागूँ   
ना जाति, ना कोई मज़हब
ना सरहद कोई लागू
मैं  सूफ़ी   साधू

यश- अपयश, माया और काया
वैभव और सुख-दुःख की छाया
का मुझपे ना ज़ादू  
मैं    सूफ़ी    साधू

ईशा-अल्लाह-राम-रहीमा
सतगुरु-बुद्धा, संत कबीरा
सबको ही भाँजू
मैं  सूफ़ी   साधू 

जीवन  की  हर  साँस भले हूँ
तन-मन की ख्वाईश से परे हूँ
तन-मन का क्या,
ये  तो  क्षणिक हैं
सत्   संकल्प,
मेरे  तो  अडिग हैं
मन पे कर ली क़ाबू
मैं    सूफ़ी    साधू    

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