मैं
सूफ़ी साधू
कुछ
भी ना माँगू
सब
कुछ तो लुटाकर
घर-
वार भी त्यागूँ
ना
जाति, ना कोई मज़हब
ना
सरहद कोई लागू
मैं
सूफ़ी साधू
यश- अपयश, माया और काया
वैभव
और सुख-दुःख की छाया
का
मुझपे ना ज़ादू
मैं
सूफ़ी साधू
ईशा-अल्लाह-राम-रहीमा
सतगुरु-बुद्धा,
संत कबीरा
सबको
ही भाँजू
मैं
सूफ़ी साधू
जीवन की हर साँस भले हूँ
तन-मन
की ख्वाईश से परे हूँ
तन-मन
का क्या,
ये
तो क्षणिक हैं
सत्
संकल्प,
मेरे
तो अडिग हैं
मन
पे कर ली क़ाबू
मैं
सूफ़ी साधू
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