साथ
मज़हब के बस्ती
में, मोहब्बत भी ज़रूरी
है
बच्चों को बुजुर्गों की, सोहबत भी ज़रूरी है
अगर
माहौल जो चाहो,
सुकूँ का और शराफ़त का
तो
ज़ुल्मों के सिकंदर
की,
खिलाफत भी ज़रूरी है
हुकूमत
मुल्क़ की गर जो, मजहबों -जातियों
पर हो
तो
अमन-ओ-चैन के ख़ातिर, बग़ावत भी ज़रूरी है
बढ़ें कुछ
फ़ासले कि जब, मुनासिब हो ना खाना भी
तो
मुफ़लिस पर अमीरों की, इनायत भी ज़रूरी है
बड़ा
मनहूस है, दंगे कराता, है
ज़रा सी बात
पर
कदम
हर, होश में रखना, हिफाज़त भी ज़रूरी है
वतन के
वारिसों, ईमानदारों, तुम कहाँ हो सो रहे
घर -
घर में
तरक्की की, सियासत
भी
ज़रूरी है
करें शैतानियाँ बच्चे, ज़माने में बुरी
जो हों
अदब
तहजीब के माफ़िक, शिकायत भी ज़रूरी है
शहर में सुर्खियाँ हैं कि, कहर क़ुदरत ने ढाया है
रहे
आब - ओ - हवा ताज़ी, रवायत भी ज़रूरी है
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