किसमें इतना आकर्षण कि, मुझको वो आकृष्ट करे
मेरे दैनिक
जीवन की, नियमितता का पथ भ्रष्ट करे
इच्छायें अनगिनत
पनपती, कौन सभी संतृप्त करे
मेरे
दृढ़ निश्चय के सम्मुख,
ठोकर से पर्वत बिदक परे
विलय
- प्रलय की बातों से फिर, कौन मुझे स्तब्ध करे
पग-पग
मार्ग हमारा जब वो, हरपल स्वयं प्रसस्त करे
मारग
के कुछ पत्थर चाहें, हों
कितने भी
सख्त भले
स्थिर
मन मेरा हर क्षण, इस जीवन को उत्कृष्ट करे
हुए निरर्थक
तन-मन में क्यूँ, कौन
भला फिर अर्थ भरे
कौन
भला फिर निश्छल मन से, पल दो पल भी व्यर्थ
करे
मानव
वो, जो हर मुश्किल
से, पल - प्रति पल संघर्ष करे
जीवन के
जटिल पलों में भी, धीरज धर, कदम सशक्त करे
वो
मानव नहीं, महामानव है,
जिसमें है साहस
धैर्य बड़ा
स्वार्थ
परे जिसने सोचा, और सोच को अपनी किया खड़ा
निश्चित
ही सच के
ख़ातिर, हाँ दुनिया से वो खूब लड़ा
तब
जाकर मंज़िल पाकर वो, कह गया जगत को अलविदा
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