कितना खोया, कितना
पाया
जब से इश्क़ का, बादल छाया
रंग- अदा - ख़ुशबू के
मद में
खुद को मैंने
कितना रुलाया
सोचा मोहब्बत, की बारिस है
दर्द की ये तो, इक साज़िश है
पल हरपल, जीना मुश्किल है
तन्हाई की,
इक आतिश है
दिल नादाँ ये, खेल ना समझे
रश्में वफ़ाई
में ये उलझे
वक़्त करे
कितना ये ज़ाया
कितना खोया, कितना पाया
आते - जाते दिलकश मौसम
ज़श्न,ये खुशियाँ, दिल के ये गम
तितली-भँवरे, गुल और गुलशन
तेरा -
मेरा बीता, हर - क्षण
धरती-अम्बर और ये कण-कण
चाँद - सितारे, तू, तेरा
दरपन
सबकुछ तो बस, माया - काया
कितना खोया,
कितना पाया
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