धरती
पे बादलों को बरसते हुए देखूँ
दरिया
को समंदर में सिमटते हुए देखूँ
सूरज
को सुबह जब भी निकलते हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही ख्व़ाब बुनूँ
रह-रह
के तेरी बातें, दुनिया को मैं सुनाऊँ
तेरे
ही रंग में रँगे, मोहब्बत के गीत गाऊँ
तेरे
ही संग चल के, सितारों पे घर सजाऊँ
तेरी
ही ख़ुशबुओं के गुलशन में गुल खिलाऊँ
कलियों
से तितलियों को लिपटते हुए देखूँ
परियों को
आसमां से उतरते
हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही ख्व़ाब बुनूँ
रश्में-ज़हां
की मुझको बिलकुल फ़िकर नहीं है
जब से
तेरी ये सूरत
दिल में उतर गयी है
तेरे बगैर
सच अब, अपनी बसर नहीं है
कैसे
कहूँ कि दुनिया कितनी बदल रही है
जब
आँख से अश्कों को छलकते हुए देखूँ
अश्कों
में रंग
प्यार का घुलते
हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही ख्व़ाब बुनूँ
माँ
- बाप की
सेवा में, कोई कसर न छोड़ों
हालात कोई भी
हो मगर घर से मुँह न मोड़ों
रूठे कोई, मना
लो, ख़ुद को मगर
बचा लो
दिल
की पसन्द को तुम फिर ज़िन्दगी बना लो
जब
ख़्वाब हकीक़त में बदलते हुए देखूँ
जुगनूं
को अंधेरों में चमकते
हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही
ख्व़ाब बुनूँ
सावन
तुझे हँसाए, सावन तुझे बुलाये
इक
फ़ासले को दोनों, मिलकर चलो मिटायें
टूटे
हजार रश्में, टूटे न दिल किसी का
आबाद
हो ज़हां ये, छूटे न घर किसी का
जब
राह में कोयल को चहकते हुए देखूँ
लहरों
को समंदर
में, मचलते हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही ख्व़ाब बुनूँ
जीवन
बड़ा सरल है, करना कभी कठिन ना
बेशक़
चरित्र -धन का, करना कभी पतन ना
तप
त्याग ख़ूब करना, विश्वास, आस रखना
जीने के
लिए कोई, खोना कभी लगन ना
चींटी
को फिसलते हुए, चढ़ते हुए देखूँ
जब
चाँद पे लोगों को, पहुँचते हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही ख्व़ाब बुनूँ
जब
भी मोहब्बतों की कोई ख़बर सुनाये
आँखों
में
सनम तेरी तश्वीर उतर
आये
जब
भी तुम्हारा मेरे तन-मन पे असर छाये
मानों
कि ज़िन्दगी ये लम्हों में गुज़र जाये
जब
धूप में एक देह को जलते हुए देखूँ
जब
आग को शोलों में बदलते हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही ख्व़ाब बुनूँ
ये ज़िन्दगी
है सूनी, तेरे ही संग पूरी
तेरे
बगैर अब तक बिल्कुल रही अधूरी
तेरे मिलन को मेरी अँखियाँ तरस रही हैं
रह-रह
के अबतलक ये बेबस बरस रही हैं
इतिहास
के
पन्नों
को
पलटते हुए देखूँ
जब
फिर से मोहब्बत को महकते हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही ख्व़ाब बुनूँ
दुनिया
बड़ी है निष्ठुर, अपना ही हित ये सोंचे
चाहें
दफ़न हो बेटी, चाहें जवान बेटे
पैरों
से रौंदते हैं, दिल के ये फैसले यूँ
बनते
हैं सगे अपने, फिर काटते गले क्यूँ
जब
बाप को बेटी पे, गरजते हुए देखूँ
कमरे
में बेटियों को सिसकते हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही ख्व़ाब बुनूँ
कैसी
है हाय, दुनिया इक भी न सुन रही है
इज्ज़त
के नाम पर ये, अपनी ही धुन रही है
खुशियाँ
बरस रही हैं, मुँह मोड़ ये रही है
फिर
बेवज़ह शहर में, बस शोर कर रही है
बरसात
में दरिया को उफनते हुए देखूँ
तूफ़ान
में बादल जो गरजते
हुए देखूँ
तुझे,
मैं याद करूँ
तेरे
ही ख्व़ाब बुनूँ
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