गुमनाम
अँधेरों में रह कर, मैं ख़ुद से बातें करता हूँ
हाँ
कभी-कभी हँस देता हूँ, तो कभी-कभी रो लेता हूँ
भरी-भरी
आँखें ये अपनी, महफिल में ले
जाऊँ
क्यूँ
फिर
मैं अपने गीतों
पर,
लोगों
से कुछ
भी चाहूँ क्यूँ
जीवन
का उद्देश्य सिर्फ़ क्या, सिद्धि-प्रसिद्धि पाना है
क्या
मुझको यह ज्ञात नहीं, जो आना है वो जाना है
बस इतना सा इल्म रहा, कुछ साथ नहीं ले जाऊँगा
अर्थहीन
कविताओं का फिर,
अर्थ भला
क्या चाहूँगा
मैं
अश्कों की स्याही में, चाहत का कलम डुबोता हूँ
फिर
जीवन की सच्चाई को, शब्दों में ख़ूब पिरोता हूँ
कोई
समझे या ना समझे, मेरा भी कुछ अनुभव है
पास
जुनूं ग़र बाक़ी है तो, कुछ भी नहीं असंभव है
जीता
हुआ एकाकी जीवन, लिखने बैठा गज़ल यहाँ
वक़्त अस्थिर सब कुछ पल भर में देता है बदल
यहाँ
जलता रहा दिये के जैसा, एक दिन फिर बुझ
जाऊँगा
शब्द
तुम्हीं कुछ बतलाओ कि कितना मैं लिख पाऊँगा
स्वर्ग
तुम्हारा
नर्क
तुम्हारा,
जीवन
का सब
वक़्त तुम्हारा
कविताओं
में अर्थ भरूँ क्या, हर अक्षर,
हर
शब्द तुम्हारा
मेरे
तन का कण-कण तेरा, मेरा अपना परिचय क्या ?
मैं
तो मात्र खिलौना तेरा, मेरा अपना अभिनय क्या ?
मुश्किल
से मुश्किल लम्हों में, डिगा कभी विश्वास नहीं
जो
भी पाया, बाँट दिया बस, रखा कुछ भी पास नहीं
जाते-जाते,
इस दुनिया को, कितना क्या दे पाऊँगा
अर्थहीन
कविताओं का फिर, अर्थ भला क्या चाहूँगा
नहीं
रहा उद्देश्य कभी,
धन संचय कर अभिमान करूँ
कोशिश
इतनी रही कि मैं भी गीतों में लय तान भरूँ
कल
ही मैंने शब्द जोड़कर, पंक्ति को लयबद्ध किया
अपनी
भाव-भंगिमा को बस दिल से मैंने व्यक्त
किया
हाँ,
मैंने
भी
गीत कई
फिर,
अपनों के सम्मुख गाये
किंचित,
मेरे अपने भी मुझको कुछ समझ नहीं पाये
स्वयं
रहा अज्ञानी जब मैं, तुमको क्या समझाऊँगा
अर्थहीन
कविताओं का फिर, अर्थ भला क्या
चाहूँगा
चंद
पलों के जीवन को फिर, व्यर्थ न होने देना तुम
साथ
रहो मिलजुल कर सारे, अम्बर को छू लेना तुम
खाली
हाँथ थे आये प्यारे, खाली हाँथ ही जाओगे
जियो
फकीरों जैसा हरपल, वरना फिर पछताओगे
रंग महल
में बैठ के
रंगों से आकर्षित
मत होना
अर्थ
के लोलुपपन के मद में, तुम परिभाषित मत होना
सीधे
- सच्चे जीवन का मैं, सबको
सच बतलाऊँगा
शब्द
तुम्हीं कुछ बतलाओ कि कितना मैं लिख पाऊँगा
जिया
हमेशा हरपल
वैसा,
जैसा सबको
दिखता
हूँ
लाख,
बुराई ताकतवर
हो,
कभी नहीं मैं
डरता हूँ
कोशिश
है हर मुश्किल हर लूँ, अपने ज़िद्द जुनूं से
और
नया इतिहास लिखूँ मैं, अपने लाल लहू से
मैं
बंजारा, चाहूँ इतना कि जन-जन
की होंठों पे
बस
जाये मुस्कान मुक़म्मल सभी मुक्त हों शोकों से
पीकर
ज़हर ज़माने का, बन अमृत बहता जाऊँगा
अर्थहीन
कविताओं
का फिर, अर्थ भला क्या चाहूँगा
कविता,
रही इबादत दिल की, कविता मेरी ताक़त है
कभी
शरारत सावन की ये, रही दिलाती राहत है
महफ़िल की कभी धूम रही, कभी दुनिया से ये दूर रही
कभी
लोगों के सिर चढ़ बोली, कहीं लोगों से मजबूर रही
शब्दों का
श्रृंगार करे और
अर्थों में ज़ज्बात
भरे
आहिस्ता
- आहिस्ता कविता, दीवानों की बात करे
कविता
तुझसे कलम मैं अपनी अलग नहीं रख पाऊँगा
शब्द
तुम्हीं
कुछ बतलाओ कि कितना मैं लिख पाऊँगा
अच्छा
होता मैं भी दुनिया के रँग - ढंग में रम जाता
बात-बात
पर अपने हित के खातिर सबसे
लड़ जाता
किन्तु ह्रदय के कम्पन मेरे, साथ नहीं देते
बिल्कुल
बात
बुजुर्गों की मुझको कर देती है अक्सर व्याकुल
चंद
पलों में
कुछ पल आख़िर सबका होकर जी
लूँ मैं
खुशियाँ
देता रहूँ अकल्पित, दुःख
के आँसू
पी
लूँ मैं
तुमको
अपने जीवन की मैं, व्यथा नहीं बतलाऊँगा
अर्थहीन
कविताओं का फिर, अर्थ भला क्या चाहूँगा
सूरज
चाँद
सितारों जितनी, रही
नहीं औकात
कभी
आज
अगर है मेरे
घर
दिन, होगी निश्चित रात कभी
धरती
पर विचरण करता एक, जीव, सृष्टि का मैं ठहरा
जिसके
पग-पग पर है हरपल, परम दृष्टि का चिर पहरा
कभी-कभी
जन जीवन के, जंजालों से इतना ऊबा
उद्वेलित
हो तन-मन मेरा, घोर निराशा में डूबा
स्वयं
प्रशस्तित
पथ पर चलता, दूर कहाँ तक जाऊँगा
शब्द
तुम्हीं कुछ बतलाओ कि कितना मैं लिख पाऊँगा
भीतर
- भीतर रो - रो कर मैं, बाहर - बाहर हँसता हूँ
विषम
व्यवस्थाओं की आख़िर, कैसी एक विवशता हूँ
पल-पल
की पीड़ा मेरी क्या, कोई तनिक
समझता है
काश
! कोई परवाह ये करता, कैसी मेरी अवस्था है
बरस
रहा है घर-घर सावन, मेरा आँगन ही तरसा
ना जाने
क्यूँ साथ हमारे, होता है
अक्सर ऐसा
गाते
- गाते गीत तुम्हारे, स्वयं बरसता
जाऊँगा
अर्थहीन
कविताओं
का फिर, अर्थ भला क्या चाहूँगा
जाति-धरम
के कोरेपन में, बँध कर रह जाता क्षन-क्षन
ग़र प्रकृति तुम्हारी गोद से पहले, तोड़ नहीं आता
बंधन
मैं नहीं चाहता किंचित यह कि जीवन भर स्वछन्द
रहूँ
पर
तीव्र हुई उत्कंठा मन में गीत-ग़ज़ल कुछ छन्द कहूँ
कुदरत
की हर एक कला से, मैं कितना अनजान रहा
चंद
किताबों के पन्नों तक, मेरा सीमित
ज्ञान रहा
तू
अनन्त सम, मैं क्षण भंगुर, तुझ पर ही मिट जाऊँगा
शब्द
तुम्हीं
कुछ बतलाओ कि कितना मैं लिख पाऊँगा
सरिता
की धारा सा बहकर, सागर से मिल आना है
छूकर धूप, बदल
बूँदों में, बादल में मिल जाना है
बादल
की करूँ सवारी मैं, धरती का आँगन मैं घूमूँ
बूँद-बूँद बन प्यास बुझाऊँ, कन-कन को जो मैं
चूमूँ
जीव-जन्तुओं
की नस-नस में बहकर दूर थकान करूँ
रक्त बनूँ, मैं
पौधों का, और चेहरों की मुस्कान
बनूँ
आख़िर
फिर सरिता की धारा, में मिलता मैं जाऊँगा
अर्थहीन
कविताओं
का फिर, अर्थ भला क्या चाहूँगा
भाषा-बोली-रीति-रिवाजों,
से मुँह मोड़ नहीं सकते
सदियों
की पूँजी है ये, जिसको तुम छोड़ नहीं सकते
ज़र-ज़मीन-जायदाद
पे तेरा ही पहला अधिकार रहा
क्यूँ
स्वाभिमान की साक्षरता को अपनाना ही भार रहा
क्या
याद नहीं कुछ, पुरखों के संघर्षों की वो गाथा है
जिसके
चलते ज़िन्दा अबतक, अपनी भारत माता है
जब
भी भूलोगे उन सबको, याद दिलाता जाऊँगा
अर्थहीन
कविताओं
का मैं,
अर्थ
भला क्या चाहूँगा
भूल
न जाना कभी कि तुम, कर्तव्यों का संवाहन हो
तुम
ही अपनी असफलता के मुख्य रूप से कारन हो
आख़िर
क्यूँ अपनी
पीड़ा को, स्वयं निमंत्रित करते हो
बिखरी
जीवन शैली को क्यूँ नहीं नियन्त्रित करते हो
देख रहा
हूँ बैठा
- बैठा,
आना - जाना लोगों का
परख
रहा हूँ पागलपन और ताना
- बाना लोगों का
मैं
तो
एक मुसाफ़िर ठहरा, हँसता गाता जाऊँगा
अर्थहीन
कविताओं का मैं,
अर्थ
भला क्या चाहूँगा
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