चलो
रे, दिल की धुन पे
बुनें कुछ
ख्वाब खुद के
सभी हम
वन्दे रब के
जियें
हम मिल के हँस के
कहीं झीलों
सा ठहर के
कभी
दरिया सा उछर के
कहीं सागर सा लहर के
कभी गागर सा सँवर के
चलो रे
......................
कभी
पेड़ों सा लचक
के
कहीं
फूलों सा
महक के
कभी
भंवरों सा
बहक के
कभी
जुगुनूं सा दमक
के
कभी शबनम सा ढल के
कहीं
सूरज सा दहक के
कभी
तारों सा चमक
के
कभी
धरती सा तरस के
कभी बादल
सा बरस के
चलो
रे ......................
कभी होंठो पे हँसी धर के
कभी आँखों
में नमी भर के
कभी
कलियों सा फिर खिल के
कभी गलियों सा
गले मिल के
कभी चिड़ियों
सा चहक के
कभी शेरों
सा गरज के
कभी
बिजली सा तड़क के
कभी शोला
सा भड़क के
कभी पर्वत
सा अकड़ के
कभी तूफां
सा उमड़ के
चलो रे
......................
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