Sunday, 14 February 2016


इस  समूचे   संसार   का,  ये  बोझ  ढोती  है
ये, ये  धरती माँ  है, ये  भी किसी की  बेटी है
सच तो यह है,  कि  हम  बोझ हैं एक बेटी पर
नासमझ लोग कहते हैं  कि बेटी बोझ होती है 

हम सदियों से इन नदियों को पूजते आये हैं
एक देवी का दर्जा देकर
हमने किसी नदी को माँ गंगा कहा
तो किसी को यमुना सरस्वती इत्यादि
अनादि काल से हमने, धन को लक्ष्मी
और विद्या को सरस्वती कहकर पुकारा
जहाँ वीर सदैव, आगे बढ़ते रहे
माँ काली के आशीर्वाद से उर्जा लेकर
हमारे जीवन में गाय का अत्यंत महत्त्व रहा
जिसे हमने माता कहकर दुलारा
यहाँ तक कि हमने अपने देश को भी
माँ कहकर संबोधित किया
फिर क्यों आज इस देश में कन्या भ्रूण को
गर्भ में ही खंडित कर दिया जाता है
जो कि एक बहन, एक पत्नी और एक माँ
का लघु रूप है
हमारी ही धरती पर रानी लक्ष्मी जैसी वीरांगना ने जन्म लिया, 
जिससे इतिहास गौरवान्वित है
इसी धरती पर “कल्पना” जैसी बेटी ने जन्म लिया
जिसकी हिम्मत का समूचा विश्व साक्षी है 
इसी धरा पर लता मंगेशकर जैसी बेटियां जन्मीं
जिनका मधुर कंठ, आज भी सदाओं में
संगीतमय लहरें घोलता है
और इसी मिट्टी की गोद में जन्मीं तेज़ दिमाग
शकुन्तला, जिसने पूरे विश्व को चकित किया
हम क्यों भूले बैठे हैं उस बछेंद्री पाल को
जिसके अदम्य साहस ने
एवेरेस्ट जैसी दुर्गम ऊँचाई को छुआ
और क्यों नहीं हम, किरण बेदी जैसी निर्भीक बेटी को
अपने समाज की तारिका मानते हैं 
क्यों भूल गये, सरोजिनी नायडू को,
जिसे आपने ही आयरन लेडी कहा
कभी आपने स्त्री की अग्नि परीक्षा ली
तो कभी दहेज़ के लोभ ने, प्राण लिए
क्या सोच कर पुरुषों ने सतीप्रथा को जन्म दिया था
भला हो उस सपूत का, जिसने इसे मिटाया
भले ही हम इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ पर हैं
शिक्षित होने के बावजूद भी, हम में वही सब है
जो जानवरों में होता है, वही पुरानी आदतें
कमजोर से क्रूरता और दुर्बल को दबाना  
बस अंजाम देने के, तरीकों में तरक्की है 

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