Sunday, 14 February 2016


भुजंग  सा  कुसंग  और ढोंगियों  सा ढंग
मुझे जातियों पे जंग, हुड़दंग नहीं चाहिये
रंग  जो  भरे  उमंग, करे    समाज  भंग   
देश   खुशहाल   बने,  ऐसा  रंग  चाहिये

कोई ना किसी को,करे तंग,चले सब संग
दुनिया  हो  देख  दंग, ऐसा  संग  चाहिये             
रंज का खुमार मिटे, दिखे हाल चाल चंग
चंद  चाक चोरों  का कोई फंद चाहिये

मन  है  मृदंग  जैसे,  उड़ती  पतंग  जैसे
किसी  सत्संग  की, तरंग  होनी  चाहिये
बंद हों  प्रपंच  सारे, मंद न हों  नंद प्यारे
ऐसे   रंग  संग  की,  सुगंध होनी चाहिये

सोंच को संभाले  संत, देश में  पधारे पंत
प्यार हो  अनंत, नहीं  अंत होना चाहिये
देश हो  अखंड, शक्ति - भक्ति हो ज्वलंत
हर खंड में बसंत अब बुलंद होना चाहिये

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