शहर
में रौनक थी कलतक, आज बस ख़ामोशियाँ हैं
सिलसिले
हैं सिसकियों के, जल रहे अब आशियां हैं
कलतलक
जिसके चमन सब, रात-दिन
गुलज़ार
थे
आज घर
- आँगन में उसके, खून के मिलते निशां हैं
अबतलक मशहूर
था यूँ, ये शहर तहज़ीब
का
और
अब बस्ती में बिखरीं, माँ - बहन की
चूड़ियाँ हैं
ज़ख्म पे मरहम लगाने,
भी ना कोई
आ सका
हर गली, नुक्कड़
पे अब
जो, इसक़दर पाबंदियाँ
हैं
माँ -
बहन - मासूम बच्चे, बेइल्म
हैं दंगों
से ये
सब
निहायती
सीधों की देखो, उठ रहीं
अब अर्थियां
हैं
किस क़दर
हैं खौफ़ खाये, लोग अपने ही घरों में
ख़ुशहाल
था हर घर
यहाँ,
अब हरतरफ बर्बादियाँ हैं
क्यों हैं
फैलीं आग का,
शोला हैं
बनकर नफ़रतें
हर
तरफ बरपा कहर
है, क्या रहीं मजबूरियां
हैं
मायने
मंदिर
के क्या
हैं,क्या है मक़सद मस्जिदों का
दरमयां
लोगों के
अबतक, बढ़ रहीं बस दूरियाँ हैं
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