Sunday, 14 February 2016

सौर मण्डल की अकेली, यह अलग संतान है


सौर मण्डल की अकेली, यह अलग संतान है
फूले-फले जीव-जन्तु, और जहाँ पर इंसान है 

सबकुछ धरती पर रहा अब तलक अनुकूल है
आज भी  गुलशन में  देखो मुस्कुराता फूल है
फिर ना जाने मज़हबी, क्यूँ भली दुनिया हुई 
और इस पर ज़ुल्म की कितनी  इम्तिहां हुई
क्यूँ भला हम पड़ गये इन सरहदों के फेर में
अब तलक जो ज़िन्दगी हम जी रहे हैं वैर में
राम ईसा और अल्लाह जब सभी रब एक हैं   
क्यों नहीं स्वीकार करते हम सभी भी एक हैं 
एक है माता हमारी,  क्यूँ नहीं हम एक हैं ?
एक ही है रब हमारा, क्यूँ नहीं हम एक हैं ?

मानता हूँ, हैं विविधिताएं बहुत भूगोल की
जानता हूँ, अनगिनत भाषायें  हैं  बोल की
पर प्राणियों में श्रेष्ठ कहलाने का हक़ होगा तभी
इंसानियत का धर्म जब दरमयां होगा कभी
इंसान तेरे पास समस्यायें भले हों अनगिनत
पर हर समस्या का तेरे पास ही निदान है
सौर मण्डल की अकेली, यह अलग संतान है ....

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