नये ख़यालों
को, खिलने दो - पलने दो |
बच्चों को
बच्चों सा, बनने दो - बनने दो ||
जब
मंजिल है कोई,
तो पथ होंगे अपने |
जब है
ज़िद और जुनूं, तो सच
होंगे सपने ||
घर – आँगन में
खेलूँ,
भौरों संग
मैं
घूमूँ |
तितली का
साथी बन,
फूलों को मैं चूमूँ ||
इस धरती पर तो
माँ,
तू ही तो अपनी है |
मैं हूँ एक
पंछी सा, तू ही तो समझती है
||
माँ खुले
आसमाँ में, उड़ने दो - उड़ने दो |
बच्चों को
बच्चों सा, बनने दो - बनने दो ||
सूरज की
ये किरणें, करती
हैं जहां रौशन |
बादलों
की रिमझिम से, खिलते हैं वन - उपवन ||
जब घूमें
ये पवनें, झूमें मेरा तन - मन |
चंदा की
चांदनी में, रातें
हँसती हर क्षन
||
राहें जाने
कितनी, नदियों की होती
हैं |
पर आखिर
में जाकर, सागर
में सोती हैं
||
माँ मुझको नदियों सा, बहने दो - बहने दो |
बच्चों को बच्चों
सा, बनने दो - बनने दो ||
क्यों शान्त कभी इतना,
रहता है समंदर
यों |
बच्चों सा कभी इतना, फिर है ये उछलता क्यों ||
क्यों इस धरती को ये,
बाहों में सिमेटे
है |
ये हवा की चादर क्यों , धरती
को लिपेटे
है ||
मैं हूँ छोटा पर माँ, मुझमें
भी समंदर
है |
है नीर नहीं
जिसमें, सपनों का
सिकंदर है ||
माँ मुझको समंदर सा, एक बार लहरने
दो |
बच्चों को
बच्चों सा, बनने दो - बनने दो ||
नदियाँ
ये बहती हैं, पर
नीर नहीं पीतीं |
क्यों
सेवा में सबकी, हैं जीवन भर जीतीं ||
क्यों
नहीं पेड़ सब ये, फल अपने खाते हैं |
हम
सबको जाने क्यों, छाया पहुँचाते हैं ||
बादल ये आसमाँ
से,
पानी बरसाते हैं |
क्या
इसके बदले ये, कुछ मुझसे पाते हैं ||
माँ
मुझको बादलों
सा, एक बार बरसने
दो |
बच्चों
को बच्चों
सा,
बनने दो -
बनने दो ||
हम क्यों इन चिड़ियों
सा, उड़ सकते नहीं हैं
|
हम क्यों
इन पवनों सा,
बह सकते नहीं
हैं ||
चलती फिरती धरती, क्यों रुकती नहीं
है |
क्या इस धरती
जैसी, बस्ती भी
कहीं है ||
गिरते बहते
झरने, क्यों थकते नहीं
हैं |
तारे ये
आसमाँ के,
क्यों बुझते नहीं हैं ||
माँ मुझको
तारों सा, एक बार चमकने दो |
बच्चों को
बच्चों सा, बनने दो - बनने दो ||
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