Monday, 15 February 2016


नये  ख़यालों  को,  खिलने दो - पलने दो  |
बच्चों  को  बच्चों सा, बनने दो - बनने दो ||

जब मंजिल  है  कोई, तो पथ  होंगे अपने  |
जब है ज़िद और जुनूं, तो सच होंगे सपने ||
घर – आँगन  में  खेलूँ, भौरों  संग मैं घूमूँ |
तितली  का साथी  बन, फूलों को मैं चूमूँ ||
इस धरती पर  तो माँ, तू ही तो अपनी है |
मैं हूँ  एक पंछी  सा, तू ही तो समझती है ||
             माँ खुले आसमाँ में,  उड़ने दो - उड़ने दो |
             बच्चों  को बच्चों सा, बनने दो - बनने दो ||

सूरज  की  ये  किरणें,  करती  हैं   जहां  रौशन |
बादलों की रिमझिम से, खिलते हैं वन - उपवन ||
जब     घूमें   ये   पवनें,   झूमें   मेरा  तन - मन |
चंदा   की  चांदनी   में,   रातें   हँसती  हर क्षन ||
राहें   जाने   कितनी,  नदियों    की    होती  हैं |
पर   आखिर  में  जाकर,  सागर  में   सोती  हैं ||
             माँ  मुझको  नदियों सा, बहने दो - बहने दो |
             बच्चों  को  बच्चों  सा,  बनने दो - बनने दो ||

क्यों   शान्त  कभी  इतना,  रहता  है  समंदर यों |
बच्चों सा  कभी  इतना, फिर है ये उछलता क्यों  ||
क्यों   इस   धरती  को  ये,   बाहों  में  सिमेटे  है  |
ये   हवा  की  चादर  क्यों , धरती  को  लिपेटे है  ||
मैं   हूँ   छोटा   पर   माँ,   मुझमें   भी  समंदर है  |
है  नीर  नहीं   जिसमें,   सपनों  का  सिकंदर है  ||
                   माँ  मुझको समंदर सा, एक  बार  लहरने दो |
                   बच्चों  को  बच्चों  सा,   बनने दो - बनने दो ||

नदियाँ  ये  बहती  हैं, पर नीर नहीं पीतीं |
क्यों सेवा में सबकी, हैं जीवन भर जीतीं ||
क्यों नहीं पेड़ सब ये, फल अपने खाते हैं |
हम सबको जाने क्यों, छाया पहुँचाते हैं ||
बादल  ये  आसमाँ  से, पानी बरसाते हैं |
क्या इसके बदले ये, कुछ मुझसे पाते हैं ||
                माँ मुझको  बादलों  सा, एक  बार  बरसने दो |
                बच्चों  को  बच्चों  सा,  बनने  दो - बनने  दो ||

हम  क्यों  इन  चिड़ियों  सा,  उड़  सकते नहीं हैं  |
हम  क्यों   इन  पवनों  सा,  बह  सकते  नहीं  हैं  ||
चलती   फिरती   धरती,   क्यों   रुकती  नहीं  है |
क्या   इस    धरती   जैसी,  बस्ती  भी  कहीं  है  ||
गिरते    बहते     झरने,   क्यों    थकते   नहीं  हैं  |
तारे    ये    आसमाँ   के,   क्यों   बुझते   नहीं  हैं ||
                    माँ  मुझको  तारों सा, एक बार  चमकने दो |
                    बच्चों  को  बच्चों  सा,  बनने दो - बनने दो ||





No comments:

Post a Comment