Sunday, 14 February 2016

मैं नीर हूँ


कभी बादल की बरसात का, कभी किसी नम आँख का
कभी सुबह की ओस का, तो कभी पपीहे की प्यास का
मैं नीर हूँ , मैं नीर हूँ, मैं नीर हूँ 

कभी झीलों में  बँधकर, मन ही मन  घबराता हूँ
कभी नदियों  में बहकर, मिलन के गीत गाता हूँ
कभी कूपों की गहराइयों में, थम  सा जाता हूँ
तो कभी  बादलों से  बिखर कर, मुस्कुराता हूँ
कभी  प्यासे  की  एक  बूँद हूँ
कभी बाढ़ का विकराल रूप हूँ
मैं नीर हूँ, मैं नीर हूँ, मैं नीर हूँ

कभी  सीप  का  तन  छू   उसे,  मोती  बनाता हूँ
कभी धरती  के आँगन में मगन हो, चमचमाता हूँ
तो कभी नन्हें पौधों से लेकर विराट पेड़ों की नसों में
लहू बनकर मैं बहता हूँ, उन्हें जीना सिखाता हूँ
अब मुझे शुद्ध करो, मैं अशुद्ध हो चुका  हूँ
अब  मुझे  राह दो, मैं अवरुद्ध हो चुका हूँ
मैं अपनी स्वच्छता और पवित्रता
को लेकर  बहुत गंभीर हूँ
मैं नीर हूँ, मैं नीर हूँ, मैं नीर हूँ

मैं हूँ, तो तेरा वर्तमान है, मैं हूँ, तो तेरा भविष्य है
मैं हूँ, तो तेरा अभिमान है, यही धरा का सत्य  है
मैं स्वच्छ हो धरती  के आँगन में, विचरना  चाहता हूँ
मैं स्वस्थ प्रकृति को जन्म दे, सागर में सिमटना चाहता हूँ
मैं धरती  की गौरव-गाथा हूँ,  मैं जीवन  की परिभाषा हूँ
मैं अपमानों को घोल बहुत, अब सम्मानों का प्यासा हूँ
मैं मोती, मैं रत्न, मैं ही हीर हूँ
मैं नीर हूँ, मैं नीर हूँ, मैं नीर हूँ

कभी- कभी  मैं व्याकुल हो,  भड़भड़ा सा  जाता हूँ
नदी  नालों  से निकल कर, जब घर में घुस जाता हूँ
खेतों में घुस बन दबंग, जब  फसलों को खा जाता हूँ
समंदर से सुनामी सा फूटकर,जब बाहर आ जाता हूँ
तब लोग कहते हैं, मैं पतित हूँ, मैं अधीर हूँ  मैं पीर हूँ
मैं नीर हूँ,  मैं नीर हूँ,  मैं नीर हूँ

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