विभिन्नता
के देश में,
अखण्डता
की आरती
है गा
रहा गरजता
हुआ सपूत
भारती
काँपने
लगे हैं सीने दुश्मनों के सुन के ये
प्रचंडता
लिए हुए
जो आ रहा महारथी
साहसी
अदम्य, शील क्षम्य,
से
भरा, चेतन्य
भय
नहीं तनिक कि
राह
में घना अरण्य है
धन्य
है धरा कि पुण्य आत्मा
की
माँ अनन्य
शूरवीर
सा प्रवीण, दंभ में नगण्य है
जिद्द
जो, प्रसिद्ध है
ये
सिद्ध कि प्रबुद्ध है
चित्त
से विशुद्ध और
युद्ध के
विरुद्ध है
वक़्त
सा जो सख्त है
सशक्त
है समृद्ध है
राष्ट्र
का जो भक्त और
कर्म
युक्त शख्स है
उसे
ही आज गर्व से
वसुन्धरा
पुकारती
विभिन्नता
के देश में,
अखण्डता
की आरती
है गा
रहा गरजता
हुआ सपूत
भारती
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